परिचय क्या, एक अनवरत खोज है मेरी, स्वयं को जानने की।

जान पाऊँ, तो संभवतः 'उस' को जान पाऊँ जो अभीष्ट है।

लेखनी ही माध्यम है इस खोज की। साहित्य साधना है, कर रही हूँ, फलेच्छा क्योंकि गीता - धर्म नहीं है, इसलिये गीता पंडित साधना - रत है ।

केवल रसिक हूँ, अतः समय और अवसर मिलते ही संगीत-कार्यक्रमों में सम्मिलित होने की उत्कंठा बनी रहती है। यदा-कदा नाटकों मे मंच-स्पर्श भी किया । घर की दीवारों पर लगे तैल-चित्रों में अपने ही विचारों को चित्रित कर पाने में अंशतः सफलता मिली । यूँ सफलता तो सागर-शोधन की तरह है।

एम.ए.इंग.(लिट.) और फिर एम.फिल.(लिंग्विस्टिक्स) किया, किंतु रूप गृहिणी का ही है।

श्रद्धेय जनक, प्रसिद्ध कवि श्री "मदन शलभ" का वरद-हस्त इस विधा में रत रहने की प्रेरणा रहा है। किसी गीत के पहले दो बोल पिता ने घुट्टी में दे दिये होंगे..... उसी गीत को पूर्ण करने के प्रयास मे लगी हूँ । वो जहाँ हैं, वहीं से मेरे स्व-धर्म और स्व-कर्म पर दृष्टि रखें।

मेरी प्रथम काव्य-पुस्तक छपने के लियें तैय्यार है...कब....समय मैं भी नहीं जानती...आप सभी की शुभ-कामनाओं की इच्छुक हूँ।

देरी से ही सही अब मन बस लिखते रहना चाहता है.....क्योंकि........


ऐसे सौरभ की घड़ी, फिर से ना आये क्या पता,
आज है जो गीत-सरिता, कल भी होगी क्या पता,
बाँध लो मन इन पलों को,आज शब्दों के वसन में,
और उतारो गीत में फिर, प्रीत की आकाश - गंगा ॥

शेष माँ शारदे के हाथ ।


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